हिन्दी भाषा नहीं, भावों की अभिव्यक्ति है।
यह मात्रभूमि पर मर मिटने की भक्ति है।।
यह मात्रभूमि पर मर मिटने की भक्ति है।।
S.Badola
कुछ दिन पहले जारी हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में हिन्दी की बाध्यता को खत्म करना बड़ा ही शर्मनाक फैसला रहा इस विचार के पक्ष और विपक्ष में आवाजें उठ रही है। उत्तर भारत के राज्यों में हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म करने के विचार एक सुर में विरोध किया जाना उत्तर भारत में हिन्दी भाषा को अधिक महत्व देना है। वहीं दक्षिण भारत में इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है।
कुछ दिन पहले जारी हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में हिन्दी की बाध्यता को खत्म करना बड़ा ही शर्मनाक फैसला रहा इस विचार के पक्ष और विपक्ष में आवाजें उठ रही है। उत्तर भारत के राज्यों में हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म करने के विचार एक सुर में विरोध किया जाना उत्तर भारत में हिन्दी भाषा को अधिक महत्व देना है। वहीं दक्षिण भारत में इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है।
गौरतलब है कि देश में अधिकतर राज्यों का बंटवारा भाषा के आधार पर किया गया है। और लंबे समय से गैर हिन्दी भाषा राज्यों में तीन भाषा सिद्धांत के तहत हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म करने की मांग की जा रही थी। हिन्दी विरोध के कई तर्क बेहद ही हल्के और स्तरहीन नजर आते हैं। हिन्दी की शिक्षा का मकसद किसी भी स्थानीय भाषा को खत्म करने का नहीं था। जाहिर तौर पर इसका मकसद देश में एकता का एक सूत्र बने रहने से था। विविधताओं के बीच यदि एकता नहीं होती है तो आखिर में ये बिखराव और टकराव की वजह बनती है।
हिन्दी से भाषा के तौर पर पूरे हिंदुस्तान से खुशबू आती है। राष्ट्र के हितों को देखें तो हिन्दी भाषा हमारी एकता और अखंडता के लिए एक ढाल कि तरह है। अगर हम इस ढाल को ही कमजोर कर देंगे यकीनन एक दिन हमें इस बात का अफसोस होगा कि समय रहते सही कदम उठाए जाते तो बेहतर होता राष्ट्र की सामूहिक चेतना का सवाल जब भी उठेगा हमें राष्ट्रीय भाषा के निर्धारण की अग्नि परीक्षा देनी होगी। राजनीति और अपने हितों को ध्यान में रखकर छेत्रवाद और भाषा को विवाद का मुद्दा बनाया जाना हमें हमारी संकुचित विचार से रूबरू कराता है। अगर हमारे अंदर राष्ट्रवाद या राष्ट्रहित के भाव है तो
हमें छेत्रावाद की सुविधाओं से निकलकर राष्ट्र भाषा के मुद्दे पर आगे आना चाहिए। हिन्दी में ही वह क्षमता है। जो पूरे देश को एक सूत्र आईमें पिरो सके।
हिन्दी भाषा नहीं, भावों की अभिव्यक्ति है।
यह मात्रभूमि पर मर मिटने की भक्ति है।।
हिन्दी भाषा नहीं, भावों की अभिव्यक्ति है।
यह मात्रभूमि पर मर मिटने की भक्ति है।।

Jai hind
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