उत्तराखंड के गांव पड़े खाली मकान में लटके ताले

हम अपने बेहतर बहविष्य की तलाश में अपने पूर्वजों की जमीन को छोड़ के आगे तो निकल आये हैं। लेकिन ये भूल गए कि शायद एक दिन हमे वापस लौट कर वापस जाना पड़े आज रतूड़ा गांव को देख कर यही लगता है कि ये धरती किसी दिन हमे कोसती होगी गांव के अधिकतर लोगों के मकान पर ताले लटके हैं। हम किसी पौधे पर पानी डालते हैं कि एक दिन बाद होकर हमे छांव देगा मगर अब वो पेड़ बन कर शहरों को छांव देने निकल पड़े हैं। रतूड़ा गाँव के अधिकांश लोग अच्छी नौकरियों पर बाहर पलायन कर चुके हैं। इसी गाँव के प्रशासन में सचिव श्री विनोद रतूड़ी जी की पहल रंग लायी और गाँव के विकास के लिए एक समिति का गठन किया गया रत्नेश्वर विकास समिति। सभी प्रवासी लोगों को गाँव मैं बुलाया गया। दिल्ली,देहरादून,चंडीगढ़ आदि जगहों से लोग गाँव आये। श्री शम्भू प्रसाद रतूड़ी,प्रकाश आदि रचनात्मक लोगों को जिम्मेदारी दी गई। गाँव में लोगों के साथ इन प्रवासी लोगों ने मीटिंग की। बंजर जमीन को आवाद करने, ख़ाली पड़े मकानों को संवार कर होम स्टे योजना से जोड़ने, बेनिताल पर्यटन को बढ़ावा देने,जंगल के बांज प्रजाति को बचाने  ,खेतों में साग भाजी का उत्पादन सामूहिक रूप से करने व गुणवता शिक्षा के उत्थान के लिए प्रस्ताव पारित किये गये। यह भी तय हुवा की हर ब्यक्ति साल में एक बार अपने बच्चों सहित गाँव जरूर आयें। लगता है ऐसी पहल से ही बदलाव आ सकते हैं।

                                 

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