देश के राजनैतिक मूल्यों की ओर जब कभी भी ध्यान जाता है तो मिश्रित से भाव मन में पैदा होते हैं। देश कितने संघर्ष के बाद स्वाधीनता को प्राप्त हुआ, इस बात से सब विदित हैं।मूल्यों ,सिद्धांतों एवं आदर्श की बात करने वाले लोग बहुत कम सुनायी देते हैं, आख़िर ऐसा क्यों? राजनीति किस लिए की जानी चाहिए,ओर किस लीए की जा रही है ? सत्ता प्राप्ति ही राजनीति का उद्देश्य है क्या, या जनता एवं देश को दिशा दिखाने वाली बात भी राजनीति को करनी चाहिए? आज भी देश में करोड़ों लोग भूख,प्यास ,घर,शिक्षा,स्वास्थ्य के लिए व्याकुल हैं, रोज़गार जुटाने के लिए आतुर हैं,अनेक प्रकार से मनोभावनाएँ अनेक रूप में प्रकट होती हैं, सामाजिक आर्थिक विषमता के बीच जीवन संघर्ष कर रहा है, वातावरण विषाक्त हो रहा है, प्रशासन में काम कर रहे लोग किस आधार पर काम करते होंगे? नैतिक ज़िम्मेदारी के प्रति कोई संवेदनशील नहीं, शहरीकरण ने परिवारों को अलगाव वाद, एकाकी जीवन, स्वार्थ एवं संकीर्ण विचार से पोषित किया है,जिसके बहुत सारे दुष्परिणाम भी मिलते हैं।आख़िर कब हम एक सुसंस्कृत समाज के शिखर पर पहुँचेंगे? अकेले राजनैतिक लोगों से इसकी आशा करना व्यर्थ है। हम सबको स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारा कर्तव्य क्या है-स्वयं के प्रति,परिवार के प्रति?समाज एवं देश के प्रति? बहुत रास्ते खुल जाएँगे हमारे लिए अपना श्रमदान देने के लिए। संसद में भी आदर्श, मूल्य एवं सिद्धांतों की बात करने वाले लोग होने चाहिये। देश के प्राचीन वैभव से प्रेरणा लेकर, ग़लतियों से सबक़ सीखकर भविष्य का भारत ऐसा होना चाहिए जहाँ सब शांति, प्रेम, भाईचारा का व्यवहार बनाकर आगे बढ़ें। धर्म के आधार पर कोई भेदभाव ना हो। आख़िर सबका एक ही रंग का रक्त है, सबकी भावना भी एक जैसी।धर्म अलग-अलग रूप में एक ही मूल बात कहना चाहता है-जियो ओर जीने दो,सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है, क्योंकि एक ही धरती है, आसमान भी एक, एक ही पानी सब पीते हैं, एक ही प्रकार का खाते अन्न सब।एक ही हम सबका रब, वही कहलाता है जय श्री राम
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